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कंट्रास्ट योजनाएं:
जो आवाज हमारे कानों तक पहुँचती हैं, पहले वह कान के पर्दो में कंपन पैदा करती हैं। यह कपन तीन छोटी हड्डियों के द्वारा कानों के मध्य भाग (middle ear) मध्य कर्ण, (hammer) हॅंमर, (anvil) एनविल एवं स्टियरअपसे गुजर कर cochlea कॉकलियॉ तक पहुँचती हैं। इसका परिणाम कॉकलियॉ के द्रवों में गतिमय होता हैं। कॉकलियॉ के अन्दर संवेदनशील कोशिकाएँ (sensitive cells) होती हैं, जो कि इन गति को नोट कर लेती हैं और न्यूरल क्रियाओं (neural activity) की शुरुआत करती हैं जो कि ऑडिटरी नर्व के द्वारा दिमाग तक पहुँचायी जाती हैं। इस प्रकार से हम सुनते हैं।
बोलना एक विस्तृत प्रक्रिया हैं। वह संरचनाएँ जिनका उपयोग, चूसने, काटने, चबाने एवं निगलने के लिए किया जाता हैं, वही बोली के उत्पादन में उपयोगी लायी जाती हैं। गले में स्थित स्वर यंत्र (vocal cords), जो कि फेफडों में किसी बाहरी वस्तु के जाने को रोकने के लिए बनायी गयी हैं, उसका उपयोग आवाज निकालने में किया जाता हैं। फेफडों से बाहर निकाली गयी हवा का उपयोग कठ ध्वनि में कंपन पैदा करने के लिए जिससे कि आवाज पैदा हैं, किया जाता हैं। आवाज उसी तरह पैदा होती हैं, जैसे कि एक गुब्बारा आवाज पैदा करता हैं, जब उसका मुँह चौडा किया जाता हैं। इस प्रकार वे संरचनाएँ जो कि साँस लेने एवं खाने कि लिए किया जाता हैं। हालाकि, दिमाग इन सबका मुख्य नियंत्रक (master controller) हैं। बोलना एक साँस लेने की, अभिव्यक्त करने की एवं ध्वनि निकालने की नियंत्रित प्रक्रिया हैं।
बोलना उन आवाजों को कहते हैं जो कि मुँह से निकाली जाती हैं एवं शब्दों का स्वरूप लेती हैं। बोलने के लिए बहुत सी चीज़ों का क्रम में होना जरूरी हैं, जैसे कि :
अगर पर्याप्त रूप से उत्तेजना उपलब्ध हो तो लगभग सभी बच्चों के लिए, ये प्रक्रियाएँ प्राकृतिक रूप से होती हैं।
कुछ बच्चों के लिए यह प्राकृतिक क्रम टूट जाता हैं। एक बार अव्यवस्था की जड पता चल जाए तो, इन क्रमों को सीधे एवं इच्छा शक्ति द्वारा सुधारा जा सकता हैं।
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अंतिम अद्यतन दिनांक: २७/०७/२०१२